कुंडा की सियासत में फिर उबाल राजा भैया के लिए सबसे बड़ा खतरा

Feb 3, 2026 - 18:09
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कुंडा की सियासत में फिर उबाल राजा भैया के लिए सबसे बड़ा खतरा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर किसी एक विधानसभा सीट ने दशकों से अपनी अलग पहचान बनाए रखी है, तो वह है कुंडा. यह सीट सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि सत्ता, प्रभाव और व्यक्तित्व की राजनीति का प्रतीक रही है. यहां 1993 से 2022 तक एक नाम छाया रहा—रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया. लेकिन 2022 के चुनाव ने पहली बार इस गढ़ में दरार की आहट दी.

राजा भैया ने निर्दलीय या अपनी पार्टी के टिकट पर लगातार सात बार जीत दर्ज कर कुंडा को अपनी कर्मभूमि बना लिया. उनका करिश्मा ऐसा रहा कि जीत का अंतर अक्सर एक लाख से डेढ़ लाख वोटों तक पहुंच जाता था. जातीय समीकरण, मजबूत संगठन और व्यक्तिगत पकड़ उनकी सबसे बड़ी ताकत रही.

हालांकि, 2022 का विधानसभा चुनाव कहानी में बड़ा मोड़ लेकर आया. समाजवादी पार्टी ने इस बार राजा भैया के पूर्व करीबी रहे गुलशन यादव को मैदान में उतारा. नतीजा यह हुआ कि जहां राजा भैया को 99,612 वोट (50.58%) अट्ठावन मिले, वहीं गुलशन यादव ने उनहत्तर 69,297 सत्तानबे  वोट हासिल कर मुकाबले को बेहद नजदीक ला दिया. जीत का अंतर घटकर लगभग 30,315 वोट रह गया—जो कुंडा की राजनीति में एक बड़ा संकेत माना गया.

इसी चुनाव के बाद से माना जा रहा है कि राजा भैया के लिए यह एक **खतरे की घंटी थी. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अब वे राष्ट्रवादी राजनीति की ओर झुकते नजर आ रहे हैं और भाजपा से उनकी नजदीकियां बढ़ी हैं. वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से उनकी अदावत पुरानी है. अखिलेश का कुंडा में दिया गया बयान—कुंडा में कुंडी लगा देंगे—और राजा भैया का जवाब—कुंडा में कुंडी लगाने वाला कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ—आज भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय है.

2027 विधानसभा चुनाव को लेकर अब दोनों खेमे पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं. राजा भैया के समर्थकों का दावा है कि वे अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के नेतृत्व में फिर मजबूती से मैदान में उतरेंगे. खास बात यह है कि इस बार राजा भैया के दोनों बेटे—बृजराज और शिवराज

—भी खुलकर राजनीति में सक्रिय हैं. माना जा रहा है कि उनका उतरना कुंडा के समीकरणों को नया मोड़ दे सकता है.

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी आत्मविश्वास से लबरेज है. पार्टी का कहना है कि 2022 में जीत का अंतर एक लाख से घटकर 30 हजार पर आ गया, और 2027 में यह अंतर पूरी तरह खत्म हो जाएगा. सपा का दावा है कि गुलशन यादव इस बार और मजबूती से चुनाव लड़ेंगे और अखिलेश यादव के नेतृत्व में कुंडा में बदलाव की पटकथा लिखी जाएगी.

अंत में सवाल वही है—क्या कुंडा में तीन दशक पुराना किला बरकरार रहेगा, या 2027 में इतिहास नया मोड़ लेगा? जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि इस बार कुंडा की लड़ाई सिर्फ जीत-हार की नहीं, बल्कि सियासी विरासत और बदलते दौर की परीक्षा बनने वाली है.

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